Tuesday, March 8, 2016

कायस्थ जाति का इतिहास(पुस्‍तक अंश)

कायस्थ जाति का इतिहास
वर्तमान काल में कायस्थ जाति काफी शिक्षित तथा सुसंस्कृत मानी जाती है और हिन्दू समाज में अपना एक स्थान रखती है ।
उत्पत्ति -
शुक्राचार्य जी को उशना भी कहते हैं, अतः उनकी स्मृति को औशनस स्मृति कहते हैं। आईये देखें यह स्मृति कायस्थ की उत्पत्ति के बारे में क्या कहती है ।

वैश्यायां विप्रतश्चैय्र्यात कुम्भकारा प्रजायते ।
कुलाल वृत्या जीवेत्तु, नापिता वा भवन्त्यतः ।।32।।
कायस्थ इति जीवेत्तु वियरेच्च इतस्ततः ।
काकाल्लौल्यं यमात्क्रौयर्य स्थपते रथ कृन्तनम ।
आधक्षाराणि संगृहम कायस्थ इति कीर्तितः ।।34।।

अर्थः-ब्राह्मण के द्वारा वेश्या स्त्री में चोरी से (जारकर्म द्वारा) कुम्हार उत्पन्न होता है । वह मिट्टी के बर्तन आदि बनाकर अपनी जीविका करे अथवा इस प्रकार क्षौरकर्म करने वाला नाई उत्पन्न होता है । वह अपने को कायस्थ कहकर कायस्थ की जीवका करता हुआ ईधर-उधर भ्रमण करे । काक से चंचलता, यमराज से क्रूरता, थवई से काटना, इस प्रकार काक, यम और स्थापित, इन तीनों शब्द के आद्य अक्षर लेकर कायस्थ शब्द की बनावट कही गई, जो उक्त तीनों दोषों के घोतक है ।
उक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि शुक्राचार्य कुम्हार नाई तथा कायस्थ की उत्पत्ति एक ही प्रकार से मानते हैं अथवा यों कहिए एक ही जाति के व्यक्तियों के ये जीविकानुसार तीन नाम हैं । व्यास स्मृति अध्याय 1 श्लोक 11-12 में कायस्थ को अन्यत्रों और गोमांस भक्षियों में परिणित किया है ।
वणिक-किरात्-कायस्थ-मालाकार-कुटुम्बिनः ।
वेरटोभेद-चाण्डाल-दास-श्वपच कोलकाः ।।
एतेऽन्त्यजाः समाख्याता ये चान्ये च ग्वाशनाः ।
एषा सम्भाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम् ।।
अर्थः-बनिए, किरात, कायस्थ, माली, बंसफोड़, स्यारमार, कंजर, चाण्डाल, कंजर, चांडाल, बारी, भंगी और कोल, ये सब अन्त्यज कहे गये हैं । इनसे और दूसरे गांमांस भक्षियों से बात करने पर स्नान करने से और इनको देखने पर सूर्य का दर्शन करने से दोष दूर होता है । महर्षि याज्ञवल्क्य ने कायस्थों को चोर डाकुओं से अधिक खतरनाक बनाकर उनसे प्रजाओं की विशेष रक्षा करने का आदेश राजाओं को दिया है । याज्ञवल्क्य स्मृति, राजधर्म प्रकरण देखिए,
चाट-तस्कर-दुर्वृत-महासाहसिकादिभिः ।
पीऽयमानाः प्रजारक्षेत्कायस्थैश्च विशेषतः ।।336।।

अर्थः- राजा को उचित है कि उचक्के, चोर, दुराचारी, डाकू और विशेषकर कायस्थों से पीड़ा को प्राप्त हुई, अपनी प्रजा की रक्षा करें ।

यम द्वितीया के दिन इन कायस्थों के यहां चित्रगुप्त की पूजा तथा कथा होती है जिसका आधार पदम पुराण का उत्तर खण्ड है । यह खण्ड बाद में जोड़ी गई प्रतीत होती है, क्योंकि इसमें समाद्विस्थ ब्रह्माजी के शरीर से एक सावला मनुष्य अपने हाथों में कलम और दवात लिये हुए उत्पन्न हुआ और जाति विषय पूछने पर ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हारा नाम चित्र गुप्त है और तुम मेरे काय (शरीर) से निकले हो, अतः तुम कायस्थ नाम से विख्यात हो जाओ और तुम धर्मराज की पुरी से सदा रहकर सभी मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मों को धर्माधर्म के विचारर्थ लिखा करें । (चित्रगुप्तोत्पत्तिप्रकाशे)
दूसरी ओर कायस्थसंस्कारप्रकाशे में विवरण मिलता है ।

कायस्थः पंचमो वर्णों नतु शूद्र कथंचन ।
अतो भवेयुः संस्कार गर्भाधानादयो दश ।।4।।

अर्थात् - कायस्थ पांचवाँ वर्ण है कभी भी वह शूद्र नहीं है । अतः उसके गर्भाधानादि दश संस्कार होने चाहिए । 

यहां पांचवाँ वर्ण का जिक्र है, किन्तु मनु 10/4 में स्पष्ट उल्लेख है कि चैथा वर्ण शूद्र है पांचवाँ कोई वर्ण नहीं है । अतः विरोधाभाष की स्थिति इन पुराने धर्म ग्रन्थ में किस वजह से आई यह विचारणीय है ।
आईये देखें श्री नवल वियोगी ‘‘सिन्धु-घाटी की सभ्यता के सृजनकर्ता शूद्र और वणिक’’ नामक अपनी किताब (पृ.क्र.-142) में क्या कहा है ।
‘‘सिन्धु देश के युद्ध में पराजित होने के बाद वध कर दिये वीरों की संतान का सम्बन्ध कायस्थ वर्ग से भी था, जिन्हें आर्यों ने गुलाम बनाकर घरों में रख लिया था । यही वह वर्ग था जिसने आर्य पुरोहितों तथा क्षत्रिय राजाओं के घरों में नौकरों का काम किया । प्रसिद्ध नरवंश शास्त्री सर हिरवर्ट होप रिसले  ‘‘बंगाल की कायस्थ जाति के बारे में अपने विचार रखते हैं - बंगाल का शार्गिद पेशा पहचाना वर्ग है जिनकी उत्पत्ति अवैध सन्तान के रूप में बतलाई जाती है । आज भी इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है । उड़ीसा की उच्च जातियों तथा बंगाल में आई कायस्थ जाति में आज भी परम्परा है, वे शुद्ध निम्न जातियों चासा तथा भंडारी की स्त्रियों को घरों में नौकरानी रख लेते हैं, क्योंकि उनमें विधवा विवाह की परिपाटी नहीं । इन्हीं सेविकाओं की संतति शार्गिद पेशा नाम से जानी जाती है । कायस्थ शार्गिद पेशा, करन शार्गिद पेशा के साथ शादी व्यवहार नहीं करते न ही राजपूत शार्गिद पेशा, कायस्थ शार्गिद पेशाओं से करते हैं । मगर वे करन के साथ शादी करते हैं।’’
यानी उपरोक्त तथ्यों का अध्ययन करें तो इस निष्कर्ष पर निकला जा सकता है कि कायस्थ कभी भी सवर्ण जाति नहीं रही है । इस संबंध में प्रमोद कुमार हंसमें एवं दिलचस्प तथ्य को उजागर करते हैं वे कहते हैं -‘‘सवाल यह है कि उस हिन्दू समाज में पत्थरों, शिलाओं व ताम्रपत्रों आदि पर लिखने का कार्य कौन करता था । जब प्रत्येक प्रकार के कार्य के लिये एक जाति थी तो लिखने के लिये भी एक जाति अवश्य रही होगी । यदि ऐसा ही था तो निःसंदेह वह जाति और कोई नहीं कायस्थ जाति ही थी । इसका सीधा सा अर्थ यही है कि लिखने की कला से यदि कायस्थ जाति ही जुड़ी थी तो वह किसी भी प्रकार आर्यों के तीन वर्णों में से एक नहीं थी, क्योंकि आर्यों को लिखने की कला का विकास 600 से 300 ई. पूर्व के मध्य ही हुआ, अर्थात् 600 ई.पू. से पहले कायस्थ जाति थी ही नहीं। इतिहासकारों का मानना यह है कि आर्यों के आने के बाद हड़प्पावासी यह कला भूल गए और बाद में फिर 600 ई.पू. के आसपास इसका पुनः विकास प्रारंभ हुआ, परन्तु मानव इतिहास में सामान्यतः ऐसा उदाहरण नहीं प्राप्त होता है कि कला का अविष्कार करने के बाद मानव समाज वह कला थोड़े समय के लिये पूरी तरह भूल गया हो । सीधा-सा अर्थ है कि लेखन कला से अपरिचित विजेता आर्यों ने पराजित हड़प्पा के लोगों द्वारा इस लेखन कला के प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगाया होगा । यही कारण है कि लंबे समय तक इस कला का सार्वजनिक प्रयोग बन्द रहा और इतिहासकारों ने यह मान लिया कि उस दौर में लोग वह कला भूल गए, जबकि वास्तव में उस कला से जुड़े परिवारों ने उसे तब तक संजोकर रखा होगा, जब तक उसका सार्वजनिक प्रयोग संभव नहीं हो गया । जो भी हो यह तो तय है कि लेखन कला का पुनः प्रारंभ जब भी हुआ होगा, उसे कायस्थ नामक जाति ने ही प्रारंभ किया होगा ।’’
वास्तव में इस सिद्धांत की उत्पत्ति इतिहासकारों के इस मान्यता के आधार पर उपजी कि ‘‘आर्य कबिलों में लेखन कला की अज्ञानता के साथ-साथ वेदों को स्मृतियों में संजोने की अभूतपूर्व कला विकसित थी,’’ लेकिन इन तथ्यों को बारिकी से जांचने की आवश्यकता किसी ने भी नहीं समझी । इस संबंध में पहला प्रश्न यह उठता है कि आर्यों का वेदों की ऋचाओं के निर्माण की आवश्यकता क्यों पड़ी, यदि हम आर्यों के पहले वेद ऋग्वेद की चर्चा करें तो पाते हैं कि ऋग्वेद - युद्ध की बातें एवं गायों तथा स्त्रियों की मांग जैसी बातों से अटे पड़े हैं, तो फिर उन्हें इसे स्मृति में रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? इस संबंध में दूसरा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में भाषा तथा लिपि का ज्ञान विकसित नहीं हुआ था ?
आईये प्रथम प्रश्न के उत्तर पर चर्चा करें । वास्तव में पहले प्रश्न का जवाब दूसरे प्रश्न के जवाब में छुपा है। हमारी यह मान्यता है कि वेद काल में लिपि का ज्ञान नहीं था । अपने-आप में एक झूठी मान्यता है । इसके निम्न कारण है:-

(1)    वेदों की ऋचाएँ, उच्चारण एवं शब्द विन्यास एक विकसित भाषा के गुण प्रदर्शित करती है । ये विकास बिना लिपियों के संभव नहीं है न ही ऐसा विकास किसी एक लिपिकीय पीढ़ी से संभव है ।

(2)    यह माना जा सकता है कि यज्ञ के दौरान इन ऋचाओं का उच्चारण किया जाता था, किन्तु इसे याद रखने की आवश्यकता इसके विस्मृत हो जाने के भय से नहीं थी, क्योंकि यदि हम लिपि का विकास चित्रकला के विकास से प्रारंभ हुआ मानते हैं तो लिपि के प्रारंभिक अवस्था में ही इन कठिन भाषा को लिपीबद्ध करना किसी करिश्मे से कम नहीं रहा होगा ।

अतःयह तथ्य की वेद काल में लिपी का जन्म नहीं हुआ था अपने-आप में एक निराधार तथ्य है । प्रमोद कुमार का यह तर्क कि चित्रलिपियों के विकास में सहभागी होने के कारण ही कायस्थ चित्रगुप्त की पूजा करते हैं , तर्क संगत लगता है तथा यह तर्क इस बात की पुष्टि करता है कि किसी खास जाति ने ही इस कला का विकास किया होगा । चूंकि भारत में सभी प्रकार के कार्य कोई खास जाति में बंटित था । उस समय सोने के जेवरात बनाने वाले तथा लोहे के औजार बनाने वालों को ज्यादा महत्व मिलता रहा होगा । चूंकि लिपिकीय कला को राजनैनिक का सामाजिक मांग कम थी, इसलिये ये जातियां जो इस कला को अपनी जीविका के रूप में अपनाती थी । निश्चित रूप से उनका महत्व कम ही रहा होगा । इसलिये ये जाति भी (आश्य कायस्थ जाति से है) दोयम दर्जे की स्थिति में रही । चूंकि आर्य व्यवस्था ने पुजारी, सैन्यकर्मी तथा व्यवसायी को छोड़कर सभी को शूद्र घोषित कर रखा था, इसलिये वे सारे कलाकार, शिल्पकार, लेखक, वैज्ञानिक, शूद्र में ही गिने गये । ये शूद्र भारत के मूल निवासी हैं ।

पुस्‍तक अंश- पृष्‍ठ क्रमांक 49 अध्‍याय दो जाति एवं गोत्र विवाद तथा हिन्‍दू करण पुस्‍तक का नाम- आधुनिक भारत में पिछडा वर्ग(2010) लेखक संजीव खुदशाह प्रकाशक- शिल्‍पायन प्रकाशन नई दिल्‍ली 

Monday, September 10, 2012

पिछड़ा वर्ग: विगत-अगत

 पिछड़ा वर्ग: विगत-अगत
·        टेकचंद
17 नवंबर 2011 के नव भारत टाइम्सके मुखपृष्ठ की खबर- ओ.बी.सी. में 100 नई जातियां।
18 नवंबर 2011 के जनसत्ताके मुखपृष्ठ की खबर- मलाईदार तबके के लिए आय सीमा दोगुनी करने की सिफारिष।
3 और 5 दिसंबर के नई दुनियाकी खबर -पिछड़े मुस्लिम वर्ग को आरक्षण।
पहली खबर में बीस राज्यों के उम्मीदावारों को फायदा मिलने की बात की गई है।  दूसरी खबर में ओ.बी.सी. के लिए बनी क्रीमी लेयर’ (मलाईदार तबके) की सीमा दोगुनी कर इसे सालाना नौ लाख रूपये करने की सिफारिष की है। तीसरी खबर से स्पष्ट हो जाता है कि सरकार मंडल आयोगके तहत सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी में अलग से 5-6 प्रतिषत कोटा तय करने जा रही है।
तीनों खबरों को और घोषित किया जाने वाले मुहुर्तको देखकर लगता है कि केंन्द्र सरकार आगामी चुनावों को ठीक उसी तरह इन्फ्लूएंसकरना चाहती है जैसे छठा वेतन आयोग लागू कर दिया था। बहरहाल! ऐसे में अन्य पिछड़ा वर्ग को जानना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। मोटे तौर पर देखे तो आज यह सामाजिक वर्ग से बढ़कर राजनीतिक अवधारणा ज्यादा लगी है। जहां-तहां राजनीतिक मंचों से उनके हितों की बात की जा रही है, लेकिन उसकी विगत स्थिति, इतिहास और भविष्य को समझने-समझाने के प्रयास कम ही दिखाई देते है।
छलित व पिछड़े वर्गों के साथ एक विचित्र सी स्थिति है कि साधन संपन्न होते ही वे भी वेदों, पुराणों की तरफ मुड़ने लगते है। जाति नामक अवधारणा से सदियों पीड़ित, शोषित, रहने के बावजूद अवसर मिलते ही स्वयं को श्रेष्ठ ठहराना और अपने नीचे एक आध छोटी जाति टोह लेते है। लोग, व्यक्ति, वर्ग अथवा ज्ञान की तह में जाति के लिए मनुस्मृति, शतपथ बा्रम्हण इत्यादि को आधार बनाते है। ऐसे में रचनाएं भी आऐंगी तो कुछ ऐसी--
ऑरजिन ऑफ सूद्र ऐ क्रिटिकल एनालसेज’: रामरतन सूद
चमार जाति का गौरवशाली इतिहास’: सत्तनाम सिंह
जाट जाति का स्वर्णिम इतिहास’: इत्यादि
डपर्युक्त जातियों तथा ऐसी ही अन्य जातियों को तथाकथित गौरव स्वर्णिम युगका अहसास करवाने के लिए उसी ब्राम्हणवादी ग्रंथ परंपरा का संदर्भ पुस्तकके तौर पर प्रयोग किया जाता है, जिनकी रचना का उद्देष्य ब्राम्हण जाति को श्रेष्ठ व अन्य के बीच स्वामी सेवक का संबंध विकसित करना था। दूसरी और वैज्ञानिक नृविज्ञान, सामाज विज्ञान, अर्थशास्त्र का उपयोग लगभग नही किया जाता है।
ऐसे परिदृष्य में एक महत्वपूर्ण शोध पढ़ने का अवसर मिलता है। आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग’ (पूर्वाग्रह, मिथक एवं वास्तविकताएं) लेखक और शोधार्थी संजीव खुदषाहने इस पुस्तक में पिछड़ा वर्ग के विगत-अगत पर गंभीर शोध किया है। उनकी सफाई कामगार समुदायपुस्तक पहले ही चर्चित हो चुकि है। प्रस्तुत-पुस्तक में पिछड़ा वर्ग की उन वास्तविकताओं को उभारा है, जो स्वयं और अन्यों द्वारा, गढ़े-रचे पूर्वाग्रहों, मिथकों में दब चुकी थी । कुल जमा 140 पृष्ठों व चार अध्याय में पिछड़ा वर्ग की उत्पत्ति, स्थिति एवं वर्गीकरणमें संजीव पिछड़ा वर्ग की वास्तविकता बयां करते है-‘‘पिछड़ा वर्ग एक ऐसा कामगार वर्ग है जो न तो सवर्ण है न ही अस्पृष्य या आदिवासी। इसी बीच की स्थिति के कारण न तो इसे सवर्ण होने का लाभ मिल सका न ही निम्नतम होने का फायदा।’’ (पृष्ठ 14) सदैव सवर्ण-अवर्ण के बीच झूलते पिछड़ा वर्ग में संजीव चेतना की कमी मानते हैं । और चेतना आती है वैज्ञानिक सोच से। पिछड़ा वर्ग आज तक धार्मिक ग्रंथों में अपनी जड़े सींचने का प्रयास करता रहा है। जहां अमुक देवता के अमुक-अमुक अंग से फलां-फलां जाति के मनुष्य की उत्पत्ति के मिथक पर आज भी पुरोहित वर्ग जान देता है। धार्मिक ग्रंथों की मानव उत्पत्ति संबंधी एक-एक मान्यता का संजीव तार्किक विष्लेषण करते है और पाते है कि स्वयं हिंदू धर्म-ग्रंथ मानव उत्पत्ति को ऐकर एकमत नही है।
मनव उत्पत्ति की वैज्ञानिक खोजों में संजीव पांच सौ (500) करोड़ वर्ष पूर्व के अजीव काल अठारह करोड़ वर्ष पूर्व के जुरेसिककाल, नवपाषाण, धातुकाल के आकड़ों का खाका प्रसतुतकर मनुष्य की उत्पत्ति और विकास को समझाते है। पिछड़ा वर्ग की सामाजिक स्थिति को परिभाषित करते हुए संजीव लिखते है कि -‘‘हिंदू धर्म में से यदि ब्राम्हण क्षत्रिय एवं वैष्य को निकाल दे तो शेष वर्ग षूद्रको हम पिछड़ा वर्ग कह सकते है, इसमें अतिषूद्र शामिल नही है। पिछड़ा वर्ग वर्षो से तिरस्कृत होता आया बल्कि यों कहें कि हाषिए पर रहा तो ज्यादा बेहतर होगा जिसे सवर्ण न हो पाने का क्षोभ है तो अस्पृष्य न होने का गुमान भी। वर्षो से हिंदू सभ्यता एवं संस्कृति को संजोए यह वर्ग आज भी अपने हस्ताक्षर को बेताब है। यदि हम पिछड़ा वर्ग को रेखांकित करें तो पाएंगे कि वर्ण-व्यवस्था का एक वर्ण शूद्र, जिनमें कुछ नई एवं उच्च समझी जाने वाली जातियां भी शामिल है जो सवर्ण होने का दावा करती है, किंतु सवर्ण इन्हे अपने में शामिल करने को तैयार नहीं है।’’ (वही 22)
यह अस्पृश्य न होने का गुमान’ ‘सवर्ण होने का दावामहत्वपूर्ण है। क्योकि इन्ही कारणों से पिछड़ा वर्ग की मानसिकता मध्यवर्ग जैसी हो चली है। उपर वाले इन्हे नीचे धकेलेंगंे और नीचे ये जाना नही चाहते। इसी संदर्भ में 28 नवंबर 2011 को दलित नेता उदितराज के नेतृत्व में हुई रैली के पर्चे को देखना जरूरी है। वे लिखते है कि -‘‘मंडल कमीषन की लड़ाई मूलतः दलितों ने ही लड़ी थी और जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री वी.पी.सिंह ने इसे लागू करने की घोषणा की तब जाकर कुछ पिछड़े वर्ग के लोग समर्थन में आए।’’
ठसी तरह की घटनाएं सन् 2004 में उस समय हुई जब मेडिकल में ओ.बी.सी. को लागू किया गया और उसका देशव्यापी विरोध किया गया। विरोध दलितों आदिवासियों को झेलना पड़ा था, क्योकि ओ.बी.सी. वर्ग तो तब भी- इसी टू बी और नॉट बी. की उहापोह भरी स्थिति में था। उनको लग रहा था कि आरक्षण की आरक्षण की मांग करने से वो शूद्रों अस्पृष्यों में गिने जाने लगेगें। इसका कारण समझ में आता है जब संजीव ओ.बी.सी. जातियों का वर्गीकरण करते है। वे इन्हे खेत कार्य, पषुपालन, कपड़े का काम, वत्रन, लोहा, धातु, तिलहन का काम, मछली पकड़ने तथा इस्कार जैसे लगभग 10-11 वर्गों में मानते है। दूसरी ओर चमार, सफाई कामगार, वैष्य, नाई, धोबी, मल्लाह, वेद्य इत्यादि को अनुत्पादककिंतु सृजनात्मक माना है। सृजन आधुनिक युग में उत्पादन ही है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सब जातियां पिछड़ी तो है किंतु साफ-सफाई खाल-मांस इत्यादि का काम करने वाली अनुसूचित जातियों के मुकाबले कुछ उन्नतहै। ऐसे में इन्हे स्वयं को उच्चसाबित करने के लिए अच्छा-खासा आधार मिल जाता है। उपर से सवर्णो के लिए वे थोड़े कम अस्पृष्य है। उनके काम धंधे भी ऐसे है जो सवर्णो के सीधे टचमें है। जैसे माली (सैनी) के फूल-फसल से, अहीर यादव के डंगरों से कुम्हार के बर्तन से , लोहार के औजार से , सुनार के गहने से, नाई के हाथ से केवट की नाव से, बढ़ई के काम से सवर्ण को उतनी घृणा नही होती जितनी मेहत्तर के मैला ढोने से, चमार द्वारा मृत पशुओं को उठाने, खाल खीचने से होती है। संभवतः वे सवर्णो (उपर के तीनों वर्ण) के सीधे संपर्क में भी उतने नही रहते जितने ओ. बी.सी. वर्ग की जातियां । इसी कारण ओ.बी.सी.जातियों ने ब्राम्हणवादी कर्मकांड पूजा-पाठ रह-सहन और सबसे ज्यादा हिंन्दू धार्मिक ग्रंथों की संस्कृति को लगभग ओढ़ लिया। वे उसमें धंस गए। उसी शतुर्मुर्ग की तरह, जो खतरा होने पर मुंडी तो रेत में छिपा लेता है लेकिन पूरा शरीर षिकारी को सौंप देता है। क्या आज पिछड़े वर्ग ने अपनी ताकत, राजनीति और अस्तित्व को दलितों से अलगाकर सवर्ण षिकारियों को नहीं सौंप-सा दिया है? संजीव तफसील से ओ.बी.सी. वर्ग द्वारा, पूजे जा रहे धार्मिक ग्रंथों के संदर्भो से ही बताते है कि -‘‘क्षत्रिय पिता व ब्राम्हण माता से सूत, शूद्र पिता व ब्राम्हण माता से चांडाल उत्पन्न होता है।’’ इन सभी स्मृति एवं पुराणों के आधार पर कोई भी पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति अपने उपर गर्व नही कर सकता। यदि वे इन धर्म-ग्रंथों को मान्यता देते है, तो उन्हे यह भी मानना होगा कि वे किसी न किसी की  अवैध संतान की संतति है। इसी तरह जाति एवं गोत्र विवाद तथा हिन्दूकरणनामक अध्याय में वे उन जातियों की वास्तविकता बताते है, जो सवर्ण होनक का दावा करती है किन्तु हिंदु धर्म ग्रंथ उनके प्रति कटुता से भरे पड़े है। कायस्थ, मराठा, भूमिहार, सूद आदि ऐसी विवादास्पद जातियां है। इसी अध्याय में गोत्रों, देवों व जातियों के हिन्दूकरण को शोधपरक ढंग से समझाया गया है।
लेखक लिखता है कि -‘‘ये पिछड़े वर्ग की जातियां जिन धर्म ग्रंथों पर अकाट्य श्रद्धा रखती है, जिनकी दिन रात स्तुति करती है, वे इन्हे इन्ही सवर्णो (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वेष्य) की नाजायज संतान ठहराते है। आज हिंदू धर्म के बड़े पोषक के रूप् में पिछड़ा वर्ग शामिल है, जिनमें हजारों-हजार जातियां है। वे सभी वर्ण-व्यवस्था के अनुसार शूद्र में आति है।’’ (वही 43)
हम देख सकते हे कि किस प्रकार आरक्षण के लिए तो पिछड़ा वर्ग आवाज उठाता है किंतु अनुसूचित जाति व जनजाति के प्रति उनमें न सहानुभूति है, न सहयोग की भावना। मंडल कमीषन हो या एससी/एसटी का विवाद सवर्णो व प्रतिक्रियावादियों का कोपभाजन 50/57 को बनना पड़ा था। यही कारण है कि पिछड़ा वर्ग आचार-विचार, संस्कार-संस्कृति कर्मकांड से पूरा सवर्ण हिंन्दूवादी बना रहेगा। साधन-संपन्न होते ही वह स्वयं को सवर्ण हिंन्दू मानने-मनवाले के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है। लेखक ऐतिहासिक तथ्य देते हुए मराठा षिवाजी द्वारा 6 जून 1674 को वंषावली, जाति सुधारने व्रातय स्तोम उपनयन तथा राज्यभिषेक का उदाहरण देता हैः यदि मान भी ले कि वंषावली सच्ची थी फिर भी षिवाजी को उंची जाति में प्रवेष करने के लिए (सामाजिक स्वीकृति) एड़ी-चोटी एक करनी पड़ी। साथ ही अपने राज्याभिषंेक के समय रूपये पानी की तरह बहाने पड़े जिसमें गागाभाट को 7000 हण दिए गए तथा षिवाजी को चांदी,तांबा,लोहा आदि से और कपूर, नमक, शक्कर, मक्खन, विभिन्न फलों, सुपारी आदि से भी तौला गया, जिसके मूल्य को ब्राम्हण में वितरित कर दिया गया। कुल खर्चा 1,50,000 हण था।’(वही 48) अब यदि उस वक्त के हिसाब से लगाएं तो एक हण तीन रूपये मूल्य का था। अर्थात आज के हिसाब से करोड़ों रूपये। इस प्रकार जब शासकों की यह हालत थी तो आम जनता की मानसिक स्थिति समझी जा सकती है।
जाति के हिन्दूकरण के साथ-साथ संजीव रक्त सम्मिश्रणतथा गोत्रों के बदलाव, ग्रहण, त्याग व हिंदूकरण पर भी तथ्यात्मक जानकारी देते है। इनमें महत्वपूर्ण है-स्थानीय देवी-देवताओं का हिन्दूकरण। वे तफसील से समझाते हे कि किस प्रकार ब्राम्हणों ने अनार्य देव षिव शक्ति गणपति आदि का हिन्दूकरण कर दिया। यहां तक कि बुध्द को भी विष्णु का दसवां अवतार घोषित कर दिया। उड़ीसा, पुरी जगन्नाथ का उदाहरण बेहद दिलचस्प है कि आदिवासियों के आराध्यदेव जगन्नाथ को इस प्रकार वैदिकों के बंधन में जकड़ा गया कि-‘‘राजाओं के प्रषासनिक हितों की रक्षा करने वाले वैदिकों ने आसानी से जगन्नाथ पर धार्मिक कब्जा कर लिया और दलितों को मंदिर से बाहर कर दिया। जगन्नाथ के दर्षन आम जनता के लिए दुलर्भ हो गए।’’(वही 70) इसी संदर्भ में हम साई बाबा (शिरडी) वैष्णों देवी, केदारनाथ, कैलाष इत्यादि व गुड़गांव, बेरी जैसे स्थानीय देव-देवियों के हिन्दूकरण और ब्राम्हणीकरण को भी देख सकते है।
तीसरे अध्याय विकास यात्रा के विभिन्न सोपानमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं का विष्लेषण किया गया है। जिससे लेखक की गहन शोध दृष्टि का पता चलता है। जैसे- जाति आधारित आरक्षण आदिकाल से ही शुरू हो जाता है। ‘‘साईमन कमीशन दलित वर्णो के लिए भी संवैधानिक संरक्षणों की सिफारिश करने वाला था, किंतु कांग्रेस तथा हिंदू महासभा ने इसका विरोध किया।’’(वही 77)
काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि पिछड़ेपन का दोष इन्ही जातियों का है,’ ‘सरकारी नौकरियों में आरक्षण गलत है,’ ‘पिछड़ेपन की शिनाख्त से जाति-व्यवस्था स्थायी तौर पर हावी रहेगी’(वही 80)। इनके अतिरिक्त मंडल आयोग की सिफारिषों पर विस्तार से बात की गई है। आरक्षण विरोधी बुद्धिजीवियों पर तीखे प्रष्न दागे गए है, जैसे-मैला साफ करने की नौकरी में आरक्षण पर दलितों का विरोध क्यो नही करते ?’
दलित एवं पिछड़ा वर्ग के बुद्धिजिवी को पंडित का दर्जा क्यों नही देते?’
मैनेजमेंट शीट क्या है? पेमेंट शीट क्या है? क्या इस रास्ते अगड़ों के बिगड़े बच्चे लाखों देकर नही आते? ये सीटें किसके लिए आरक्षित है?’
आरक्षण के विरोध को आंदोलन के रूप में क्यों पेष किया जाता है?’
ऐसे ही सवालों से जूझता लेखक सामाजिक-व्यवस्था पर प्रहार करता है-मेरी दृष्टि में आंदोलनरत डाक्टरों तथा सवर्ण पंचायत द्वारा सरपंच पद के लिए पर्चा दाखिल करने वाली दलित महिला को नंगी करके गांव में घुमाकर जला देने वाले जातिभिमानी लोगों में कोई अंतर नही है।’ (वही 85)
लेखक ने पिछड़े वर्ग के संत नामदेव, संत चोखामेला, संत कबीर, गुरू नानक, संत सेनजी, महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार ई.वी.रामास्वामी, नारायण गुरू, संत रैदास इत्यादि समाज-सुधारकों के संघर्षो का ब्यौरा दिया हे और इसके बावजूद पिछड़ा वर्ग के अब तक पिछड़ा बना रहेन पर क्षोभ प्रकट किया है।
अंतिम अध्याय चार पेशे के आधार पर पिछड़ा वर्ग (षूद्र जातियों) की जातियों की विवेचना प्रस्तुत करते है । मंडल कमीशन की सिफारिषों को ज्यों का त्यों अंग्रेजी में प्रकाषित भी किया गया है। इसी आधार पर पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित जातियों की आधिकारिक सूची जारी की है।
अंत में लेखक ने महत्वपूर्ण समाधान भी प्रस्तुत किए हे जो बेहद महत्वपूर्ण है, जो आज के समय में दलितों एवं पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ अन्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कहा जा सकता हक कि अपने शोध परक दृष्टिकोण एवं सीमित कलेवर के कारण पुस्तक न केवल पठनीय हे बल्कि जरूरी भी है।
यह उनकी पिछली पुस्तक सफाई कामगार समुदायको सार्थकता व संपूर्णता भी प्रदान करती है। एक तरह से बौद्धिक रूप् से यह पुस्तक हमें और ज्यादा मांजेगी, हमारी सोच को और परिष्कृत करेगी ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
टेकचंद
म.न.166 गांव नाहरपुर
रोहिणी सेक्टर-7 दिल्ली 110085
सौजन्य से त्रैमासिक पत्रिका 'अपेक्षा' जुलाई दिसम्बर अंक क्रं 36-37
पुस्तक ‘‘आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग’’ के बारे में अन्य जानकारी एवं समीक्षा पढ़ने के लिए इस किताब के ब्लाग पर लागआन करें।

पिछडे वर्ग के महात्मा ज्योतिराव फुले ने दलितों को उठाने के लिए किताब लिखी 'गुलामगीरी'
और दलित वर्ग के संजीव खुदशाह ने पिछड़े वर्ग को उठाने के लिए किताब लिखी 'आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग'